धरती, धर्म और युद्घ


✍अमृतलाल मालवीय-विभूति फीचर्स

विश्व इतिहास का यदि हम अवलोकन करें तो ज्ञात होगा कि विश्व के छोटे-बड़े देशों में आंतरिक या बाहृय स्तर पर जो भी युद्घ हुये उनके पीछे आर्थिक कम धार्मिक सत्ता का विस्तार होना अधिक पाया गया।

धरती अपनी जगह स्थिर व अडिग है पर इस पर सत्ता जमाने वाले धर्म निश्चित ही चलायमान/ गतिशील हैं। यह एक बहुत बड़ी विसंगति है। धरती पर धर्म का नहीं मानवता का कब्जा होना चाहिए तभी ये सारे विवाद/ युद्घ समाप्त किये जा सकते हैं। इस मानवता की रक्षा के लिये समस्त अमानवीय संगठनों/ आतंकवादियों एवं इन्हें संरक्षण, सहयोग, समर्थन देने वालों के प्रति कड़ी कार्यवाही विश्वस्तर पर की जाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

आतंकवाद चाहे ओसामा बिन लादेन का हो, दाउद इब्राहिम का हो या किसी पूर्वी/पश्चिमी देशों के आतंकवादियों का हो उसका मुकाबला विश्वस्तर पर एकजुट होकर करने पर ही सार्थक परिणाम मिल सकते हैं। इसे किसी धर्म या मजहब से जोडऩा बड़ी भूल होगी क्योंकि यह तो काला नाग है जिसने इसे दूध पिलाया वह बचा नहीं है। अत: जो भी इसे पनाह देंगे वे स्वयं भी नष्ट हो जायेंगे। धर्म कभी भी अमानवीय नहीं हो सकता, जो लोग आतंकवाद को सहारा, संरक्षण दे रहे हैं वे निश्चित ही अपने धर्म के संरक्षक नहीं हो सकते। धर्म विस्तार आतंक से नहीं प्रेम, दया, सद्भाव तथा साधना से ही संभव है।

इस आतंकवाद को जड़मूल से समाप्त करने हेतु विश्व के सभी देशों को एकजुट होकर उन कार्यवाहियों का साथ देना चाहिए जो इस दिशा में अमेरिका, नाटो एवं विश्व के अनेक देशों द्वारा की जा रही है। युद्घ के परिणाम अवश्य ही घातक होते हैं किंतु परिस्थितिवश या परिणामस्वरूप युद्घ की स्थिति बनती है तो इसके सार्थक परिणाम भी सामने आते हैं। क्या बिना फौजी कार्यवाही के इस आतंकवाद को रोका जा सकता है? नहीं, आतंकवादियों व इन्हें संरक्षण देने वालों को जरूर सजा मिलना चाहिये चाहे वे किसी भी देश, धर्म के क्यों न हों, इस समस्या के स्थायी हल हेतु कूटनीतिक, आर्थिक तथा फौजी कार्यवाही पूर्ण विवेक एवं धैर्यतापूर्वक की जाना चाहिए। इस कार्यवाही में सजा निर्दोषों को न मिले यही हमारी कामना है। मानवता की बलि देकर धर्म की आड़ में हमें विश्व को विश्व युद्घ धर्मान्धता से ऊपर उठाकर आतंकवाद के खिलाफ की जाने वाली कार्यवाही मेें सक्रियता से भागीदार बनना चाहिये तभी इस धरती पर शांति स्थापित हो सकेगी।
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